रुख-ए-पुरनूर का आया ख़याल

++ग़ज़ल++(2122 2122 2122 212 )
आज फिर से उस रुख-ए-पुरनूर का आया ख़याल
और उसकी दीदा-ए-मख्मूर का आया ख़याल
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झाँक कर माज़ी में जितनी बार देखा ग़ौर से
उस शबाब-ओ-हुस्न में मगरूर का आया ख़याल
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दो घड़ी में ख़्वाब जब आँखों से ओझल हो गए
तब मुझे अपने दिल-ए-रंजूर का आया ख़याल
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रूह तक जाने की ख़ातिर जिस्म है ज़रिया फ़क़त
इश्क़ में गहरा जो उतरा दूर का आया ख़याल
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सर पे चढ़कर मयक़दे में बोलने जब मय लगी
और ज़ाहिद को अचानक हूर का आया ख़याल
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कौन देखे तीरगी ख़ुद में समेटे जो चराग़
इस ज़माने को हमेशा नूर का आया ख़याल
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आपकी सरगोशियाँ होती है जब भी क़ल्ब में
इश्क़ का भूले जो हम दस्तूर का आया ख़याल
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चंद जो लम्हात भारी थे जुदाई के समय
चश्मे नम और उस दिल-ए-मजबूर का आया ख़याल
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यक ब यक वो इस तरह आये तसव्वुर में ‘तुरंत’
जैसे गर्मी में अचानक तूर का आया ख़याल
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
26 /03 /2018
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शब्दार्थ -रुख-ए-पुरनूर=चमकता हुआ चेहरा,
दीदा-ए-मख्मूर= नशे में चूर आँखें
माज़ी=भूतकाल ,दिल-ए-रंजूर=दुखी हृदय
ज़ाहिद=संयमी,धार्मिक ,सरगोशियाँ =कानाफूसियाँ
चश्मे नम=गीली आँखें,तसव्वुर=कल्पना ,तूर=एक पहाड़

         

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