आफ़ताबी ज़िन्दगी

आफ़ताबी माहताबी रौश्नी है ज़िन्दगी
आशना हो कर भी खुद से अजनबी है ज़िन्दगी

वक़्त से हासिल जो हो उन क़ीमती लमहात में
जी लो जी भर के जहां में क़ीमती है ज़िन्दगी

रात की मानिंद है इस मौत का दस्तूर भी
सुबह ढल जाएगी ये भी चाँदनी है ज़िन्दगी

हाथ खाली आए थे हम हाथ खाली जाएंगे
नाज़ क्यूँ करते हो इस पर मुफ़लिसी है ज़िन्दगी

ढल रही उम्र भी तो ढलते सूरज की तरह
हाथ बांधे मौत के आगे खड़ी है ज़िन्दगी

उम्र लम्बी चाहता है साद हर इक आदमी
पर बशर के वास्ते तो बेबसी है ज़िन्दगी

अरशद साद रुदौलवी

         

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