“इंतज़ार रहता है”…

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दिल से जुड़ने के लिये एक महीन तार रहता है ।
धड़कन समझता है कोई बेक़रार रहता है ।
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कितने अनमोल होते हैं ये अपनों के रिश्ते ,
कोई याद न करे तो भी इंतज़ार रहता है ।
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भले सब इल्ज़ाम लगाये आभासी दुनिया का ,
मगर पास रहकर भी आज कहाँ प्यार रहता है ?
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हो कोई उलझन तो उसे साझा करना ज़रूर ,
गलतफ़हमी के तले ही अक्सर ख़ार * रहता है ।
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गुमनामी की ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है भला ?
ज़रा याद करो , किस गली मेरा यार रहता है ?
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साँसों की डोर अटकी होती प्रेम के सहारे ,
ढूँढो तो , किस तरफ़ मोह का संसार रहता है ?
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बड़ा अज़ीब लगता है ये सोच-सोचकर “कृष्णा”,
है कोसों दूर फिर भी क्यों ऐतबार रहता है ?
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* ख़ार = काँटा
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— °•K.S. PATEL•°
( 15/05/2018 )

         

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