“इन दिनों”…

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यकीं है मुझे कोई पढ़ता रहा है इन दिनों ।
दिल की बात कोई सुनता रहा है इन दिनों ।
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ग़मे-हयात * अभी भूल जाने की ज़रूरत है ,
खुशियों के पल कोई चुनता रहा है इन दिनों ।
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पहले जो दर्द रहा , अब बन गया है उपचार ,
ठीक चिकित्सा कोई करता रहा है इन दिनों ।
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बड़ी खामोशी से अहसास आते रहे मगर ,
इन साँसों में कोई घुलता रहा है इन दिनों ।
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मानो पर निकल आये हों कुछ अमिट यादों के ,
हर ख़्वाबों में कोई पलता रहा है इन दिनों ।
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चलो ये दीवानगी का हद तो कुछ पता चला ,
हर पल में कोई सम्हलता रहा है इन दिनों ।
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अपना नसीब ग़म से भले बेग़ाना है नहीं ,
मगर नसीब कोई बदलता रहा है इन दिनों ।
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आसानी से मुहब्बत भी त्यागा नहीं जाता ,
किसी आग में कोई जलता रहा है इन दिनों ।
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जाओ सब बेरूख़ी माफ़ “कृष्णा” की ओर से ,
मुझमें आकर कोई ढलता रहा है इन दिनों ।
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* ग़मे-हयात = जीवन के दुख
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— °•K.S. PATEL•°
( 08/05/2018 )

         

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