इश्क़ जब से आप से हमें हुज़ूर हो गया

++ग़ज़ल++(212 1212 1212 1212 )
इश्क़ जब से आप से हमें हुज़ूर हो गया
ज़िंदगी में हर तरफ़ ख़ुदा का नूर हो गया
***
आपके हयात में पड़े क़दम हुआ ग़ज़ब
दिल हमारा यक ब यक सनम गफ़ूर* हो गया (*रहमदिल )
***
तन गई कमान क्यों सरे-पलक* है आपकी (*पलक के ऊपर )
क्यों ख़फ़ा हुए जनाब क्या क़ुसुर हो गया
***
देख कर शबाब आपका खिली कली कली
इक शरर* लगी है क़ल्ब** बेशऊर हो गया (*चिंगारी **दिल )
***
आप बन गए हुज़ूर इस जहाँ में हमसफ़र
ख़्वाब हर रक़ीब का है चूर चूर हो गया
***
दास्ताँ कहें किसे कि आज इक हसीन के
ज़ुल्म का शिकार दिल ये बेक़ुसूर हो गया
***
अब्र* अब मुसीबतों के आसपास हैं नहीं (*बादल )
ज़ीस्त* से हमारे ग़म हबीब** दूर हो गया (*ज़िंदगी,**प्रिय )
***
दे रहे हैं आप साथ जिस तरह क़दम क़दम
प्यार पे है आपके हमें गुरूर हो गया
***
किसलिए शराब को लगाएं हाथ हम ‘तुरंत’
आपकी मय-ए-नज़र* का जो सुरूर हो गया (*आंखों की सुरा )
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘बीकानेरी
10 /05 /2018

         

Share: