उलझनों में ही उलझती

उलझनों में ही उलझती ज़िन्दगानी रह गयी।
बस वफ़ाओं की बदौलत शादमानी रह गयी।।

तुम फ़लक पर चाँद बनकर रौशनी देते रहे।
मैं महकती सी तुम्हारी रातरानी रह गयी।।

हर घड़ी अहसास तेरा अनछुआ वो मन-छुआ।
बात सच्ची इक यही दिल की बतानी रह गयी।।

ख़्वाब सब बेनूर हैं बेरंग गुमसुम रौनकें।
ज़िन्दगी तुम बिन कहाँ अब ज़ाफ़रानी रह गयी।।

ढल रही है शब उदासी दर्द का आलम हुआ।
ये सुपुर्दे-ख़ाक दुनिया फ़ानी-फ़ानी रह गयी।।

ज़िस्म को करके जुदा जग हो गया मसरूफ़ पर।
रूह में ठहरी मुहब्बत की रवानी रह गयी।।

बनके दुश्मन ये मुकद्दर पल सुनहरे ले गया।
पर हँसी जिससे ‘अधर’ पर वो निशानी रह गयी।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

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