“ऐतबार भी बहुत ज्यादा है”…

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न कोई वादा , न कोई कसमें , फिर भी साथ जाने का इरादा है ।
कोई है इक हमसफ़र जिसपे ख़ुद से ऎतबार भी बहुत ज्यादा है ।
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क्या-क्या ख़्वाहिश है , एक बार पूछकर देख लिया मेरे हमसफ़र से ,
अब कुछ न चाहिये कहती है , उसका जीवन इतना सीधा-सादा है ।
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क़शिश का ये हसीन दौर मानो एक ही मंज़िल के हों दो मुसाफ़िर ,
अब चाहे कुछ हो अंज़ाम , रूकने वाला यात्रा नहीं मुबादा * है ।
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वहशत * का ये अज़ीब आलम , जागते हुए भी वो , ख़्वाबों में भी वो ,
साथ पाने की असीम चाहत , दिल ने दिल को किया बहुत तग़ादा है ।
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अपनी झोली में लेकर चल रहे , बेहिसाब एहसासों का जादू ,
लग रहा यूँ जैसे अब ज़िंदगी कुछ अलग करने के लिए अमादा है ।
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ख़ैर कोई पागल कहे या दीवाना कहे या फिर कह दे सरफ़िरा ,
आखिरी साँस तक प्रीत बरक़रार रहेगी , दुनिया से ये वादा है ।
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धन-दौलत के मामले में शायद नज़र आये है गरीब ये “कृष्णा”,
मगर प्यार में तौलकर देखो तो पाओगे इश्क़ का शहज़ादा है ।
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* मुबादा = शायद
* वहशत = उन्माद
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— °•K.S. PATEL•°
( 13/10/2018 )

         

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