“ऐतबार रहता है”…

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न जाने कौन-सी क़शिश है , जो ये दिल बेक़रार रहता है ?
दूर होकर भी कोई हर पल ज़ेहन में सवार रहता है ।
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इस ज़माने में भरोसा न जाने कितनों ने हरदम तोड़ा ,
मगर कोई तो है जिस पर पल-पल अब ऐतबार रहता है ।
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अब यह आलम है कि मेरी ज़िंदगी में रात और दिन मानो ,
हर एहसास हर ख़्वाबों में बसने को तैयार रहता है ।
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इक तसल्ली से अब जीने की उम्र और बढ़ गयी है सच में ,
ग़मों की परवाह नहीं , अब इस दर पे ग़म-ग़ुसार * रहता है ।
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ख़फ़ा होने का इक डर भी , हमेशा सताता रहता अब तो ,
कुछ अनहोनी मत हो , साथ में ख़्वाहिश ख़ता-क़ार * रहता है ।
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एक अतृप्त प्यास है , जो पूरी होने का नाम न ले रही ,
पता है मिलन तो होगा नहीं , फिर भी इंतज़ार रहता है ।
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कैसे कहे येे “कृष्णा” कि अब ज़िंदगी से और कुछ चाह नहीं ?
ये क़मबख़्त दिल तो किसी के साथ का तलबग़ार * रहता है ।
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* ग़म-ग़ुसार = शुभचिंतक
* ख़ता-क़ार = दोषी
* तलबग़ार = इच्छुक
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— °•K.S. PATEL•°
( 30/09/2018 )

         

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