ऐसी रही है अपनी मुहब्बत की रहगुज़र

++ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 )
ऐसी रही है अपनी मुहब्बत की रहगुज़र
थे खार जैसे ग़म कभी खुशियाँ थीं हमसफ़र
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माज़ी की राख से मिले अंगार अब तलक
हमने किया है यार तुम्हें प्यार इस क़दर
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फ़रज़न्द बेटियां सभी जायेंगे छोड़ के
कोई चले न साथ क़ज़ा आये जब बशर
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जैसी मिली है ज़िंदगी रखना सँभाल के
हिम्मत से काम ले कभी तू ख़ुदक़शी न कर
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गर ख़्वाब कोई आ गया वापस न हो कहीं
आँखों में ख़त्म कीजिये हर ख़्वाब का सफ़र
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करते गुनाह आप रहे ध्यान में सदा
हर वक़्त हर गुनाह पे रखता ख़ुदा नज़र
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आफ़ात मुश्किलात से जख़्मी अगर हो दिल
है सब्र इक इलाज बशर जल्द सब्र कर
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पुरखार रास्ते हैं मगर राहबर नहीं
लेकिन जुनून से मिले मंज़िल की हर ख़बर
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रिश्तों में दूरियाँ हो ज़रा सी कभी कभी
करती ‘तुरंत’ जीस्त में जादू भरा असर
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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