औकातें हसीन लगतीं

जिस शख्स की बदौलत रातें हसीन लगतीं|
उसकी तरह ही उसकी बातें हसीन लगतीं|
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औंरो का वार रोके अपना शिकार कहकर,
दुश्मन मुझे तो तेरी घातें हसीन लगतीं|
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यूँ तो है रास किसको नचना उछल उछल के,
तुम छत से झांकते बारातें हसीन लगतीं|
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सस्ते लिबास में पर ढंककर बदन को निकलें,
मुझको गरीबों   की  औकातें  हसीन  लगतीं|
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हर लफ्ज में पिरोया तुझको गया है यारब,
यूँ ही न सबको मेरी नातें हसीन लगतीं|
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ऐसे भी हुक्मिरा हैं बांटें जो आदमी को,
जिनको मनुज अभी तक जातें हसीन लगतीं|

         

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