“कसम से पहले”…

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कुछ भी कहना मुनासिब नहीं बढ़ते कदम से पहले ।
आँख उठाकर देखते क्यों नहीं इक शरम से पहले ।
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कितनी शिद्दत से कोई चाहे पता लग जायेगा ,
हाथ आगे बढ़ा तो ले कोई भी कसम से पहले ।
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जी बहलता ही नहीं , अब ये घड़ी और बेताब पल ,
आसान हो अगर ज़िंदगी तो अच्छा भरम से पहले ।
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सोच का अलाव आहिस्ता-आहिस्ता ही सुलग रहा ,
और सभी कुछ यादों में उतर गया करम से पहले ।
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भले ही लब ख़ामोश से नज़र आ जाते हैं अक्सर ,
मगर ख़्वाहिश यूँ तेज चल पड़ते हैं कलम से पहले ।
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इश्क़ भी किया और इंतज़ार की हद भी पार की ,
तब कहीं जाकर अहसास जी पाए सनम से पहले ।
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अबकी बार रूत बदली तो किस्से कह रहें हैं लोग ,
मगर भूलते कठोर होता कोई नरम से पहले ।
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मस्ती का एक मस्त सफ़र है , हमसफ़र बात समझ लो ,
और जी भर के जी लो ज़रा अगले जनम से पहले ।
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शहरे-मुहब्बत के बाशिंदे ख़ास होते हैं “कृष्णा”,
ये आसानी से हार माने नहीं चरम से पहले ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 29/01/2019 )

         

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