“कैसे हटाऊँ तुझे”…

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दिल की धड़कन कहो तो इक बार सुनाऊँ तुझे ।
चाहत की परिभाषा कहो तो बताऊँ तुझे ।
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आसानी से कैसे कहा , चाहत नहीं पता ?
क़शिश रही कभी , उसे क्या याद दिलाऊँ तुझे ?
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दिल की बात इक बार जो प्यार से सुन लो कभी ,
इश्क़ के मैदां में आओ तो हराऊँ तुझे ।
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कहते हैं लोग अब मैं किसी काम का न रहा ,
तुम ही कहो , ज़ेहन से कैसे हटाऊँ तुझे ?
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ग़र वक़्त की आँधी ने वादों को भुला दिया ,
फिर से कह दो तो पक्की कसम खिलाऊँ तुझे ।
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कभी तेरी ये चुप्पी बिल्कुल रास न आती ,
साँसों के डोर जो सुलझे तो मनाऊँ तुझे ।
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“कृष्णा” की चाह का अंदाज़ा ज़रा लगाओ ,
तो रोम-रोम में सदा बेझिझक बसाऊँ तुझे ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 03/09/2018 )

         

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