“कोई अफ़साना है”…

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भले लोग कहें कैसी ये हरकत कैसा पैमाना है ?
मगर निग़ाहे-यार कहती है , ये कोई अफ़साना है ।
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अपना ही दिल मानो पराया हो गया है अभी सच में ,
आख़िरकार ये किस तरह का दिल से दिल का लगाना है ?
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कोई सूरत नज़रों में बार-बार आये तो क्या करें ?
अब तो खत्म भी हो गया मिलने का सारा बहाना है ।
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प्यार से दो बोल निकाल दो ये फ़िज़ा में तो बात बने ,
वरना सारा शहर यहाँ घूमकर देखो बुतख़ाना है ।
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व्यवहार में लचीलेपन की कारगर दवा तो मिला दो ,
उम्र खत्म होने तक हर-इक रिश्ते को जो निभाना है ।
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कोई भी ज़िद सदा आपस में दूरियाँ बढ़ा ही देती ,
सो समझकर एक-दूजे को गलतफ़हमियाँ मिटाना है ।
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अपने-आपको इतना बदल डालो सबके सामने कि ,
याद करना नहीं पड़े कब , किधर , कैसे मुस्कुराना है ?
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ज़ख़्मों को देकर पूछने लगते हैं , क्यों क्या हुआ भई ?
और इस हरकत से कठघरे में अब सारा ज़माना है ।
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रूप , धन-संपत्ति किसी का भी घमंड ठीक नहीं “कृष्णा”,
एक वक़्त के बाद तो सबको मिट्टी में मिल जाना है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 10/06/2018 )

         

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