कोई मरासिम नही तुम से

दिल में हसरत है किसी रोज़ मनाने आओ
और मिरी आँख में ख़ाबों को सजाने आओ

तुम मिरा दर्द ना बाँटो तो कोई बात नहीं
बस मिरे ज़ख़्म पे मरहम ही लगाने आओ

सिर्फ हाथों के मिलाने से नहीं होगा कुछ
तुमको मिलना है अगर दिल को मिलाने आओ

मिल गई उफ़ ग़म-ए-जानाँ से रिहाई मुझको
तुम किसी रोज़ मुझे फिर से सताने आओ

तोड़ कर फिर से किसी रोज़ ये ज़ंजीर अना
तुम मिरे पास गिले शिकवे मिटाने आओ

दिल में रौशन है मिरे याद की जो कन्दीलें
तुम वो कन्दील किसी रोज बुझाने आओ

दरमियाँ कोई मरासिम ही नहीं अब अपने
साद को इतना फ़क़त याद दिलाने आओ

अरशद साद रूदौलवी

         

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