“कोई वास्ता रखना”…

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दो दिन की ज़िंदगी में मिलने का बस सिलसिला रखना ।
हम साथ हों लें , कुछ इस तरह बनाकर रास्ता रखना ।
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कदम-कदम बिछे हुए हैं अनगिनत कंटीले काँटें ,
कब ज़रूरत पड़ जाए , सम्हाल मेरा पता रखना ।
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ज़माने ने ज़रूरत के आधार पर पुकारा मुझे ,
तुझे कुछ अलग जो लगे तो नाम मेरा नया रखना ।
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आसान तो नहीं मगर कर लेना यक़ीन लफ़्ज़ों पर ,
जो कह दिया सो कह दिया , बोलों पर आसरा रखना ।
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मुझे नहीं मालूम कि स्वार्थी रिश्ता क्या है ?
निःस्वार्थी लगूं तो ही मुझसे कोई वास्ता रखना ।
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आवाज़ दोगे जब , हो जाऊँगा मौसम में शामिल ,
खिल जाओगे तुम भी , ज़ज़्बातों को मत दबा रखना ।
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अज़ब बिसात है ये ज़िंदगी का , देखे है “कृष्णा” ये ,
अक़्स मेरा देखना है ग़र , साथ आईना रखना ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 11/12/2018 )

         

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