क्यों कश्मकश में हो

कह दो वफा कुबूल है क्यों कश्मकश में हो|
बाकी तो सब फिजूल है क्यों कश्मकश में हो|
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जिस पर तुम्हें गुरूर तुम्हारा बदन कहाँ,
ये तो जमीं की धूल है क्यों कश्मकश में हो|
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मिलता उसे ही कुछ है जो खोता है कुछ यहाँ,
जग का यही उसूल है क्यों कश्मकश में हो|
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उजड़े हुए चमन से जो खुश्बू सी आ रही,
जिन्दा कोई तो फूल है क्यों कश्मकश में हो|
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देदो सजा या छोड़ दो उल्फत तो की मनुज,
इतनी सी अपनी भूल है क्यों कश्मकश में हो|

         

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