गुलदस्ता ए ग़ज़ल हो कि कोई ख्वाब

ग़ज़ल
गुलदस्ता ए ग़ज़ल हो कि तुम कोई ख्वाब हो।
बाद ए तहूर ए हुस्न ओ अदा लाजवाब हो।।

फुर्सत में है बनाया गया तुमको जां नशीं,
तुम शायरी की कोई मुकम्मल किताब हो।।

तुम हुस्ने जां गुदाज़ हो के हुस्ने आतशी,
सुबह ए बहार ए नौ का नया आफ़ताब हो।।

दोनो जहान झूम उठे जिसके जिक्र पर,
आतिश पे हुस्न के जो खिंची वो शराब हो।।

दोशीजगी भरा है तेरा सुबकतर बदन,
मिसरी की इक डली हो कि ताजा गुलाब हो।।

अल्लाह के घरों से हो निकली हुई सदा,
आब ए हयात तुम हो कि कार ए सवाब हो।।

तुमपर नज़र है सारे ज़माने की ऐ मिलन,
किस्मत के बादशाह हो तुम कामयाब हो।।
——–मिलन साहिब।
बाद ए तहूर- स्वर्ग की पवित्र शराब
हुस्ने जां गुदाज- जान लेवा सौन्दर्य
हुस्ने आतशी- जला डालने वाला हुस्न
दोशीजगी- सुकुमारिता
सुबकतर- कोमल
आब ए हयात- अमृत
कार ए सवाब- पुण्य की कृति/फल

         

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