घायल अगर हुआ कोई परवाना प्यार में

++ग़ज़ल++( २२१ २१२१ १२२१ २१२ )
घायल अगर हुआ कोई परवाना प्यार में
जायेगी जान इश्क़ के बढ़ते बुख़ार में
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उल्फ़त की चाहतें करें ऐसा ग़ज़ब असर
मुश्किल बड़ा है दिल रहे फिर इख़्तियार* में (*नियंत्रण )
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जिसने भी एक बार लिया लुत्फ़ हिज़्र का
मिलता कहाँ मज़ा उसे चैन-ओ-क़रार में
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तारीख वस्ल की बढ़े मंज़ूर अब किसे
इतना कहाँ है सब्र दिल-ए-बेक़रार में
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उनको ख़ुशी है जीत की हमको न ग़म कोई
यकशां मज़ा है इश्क़ की इस जीत हार में
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पाने की आस कर न मुहब्बत में यार तू
देने की आरज़ू जगा दिल के दियार* में (*घर)
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महसूस हो अगर कभी रिश्तों में कुछ दरार
सीमेंट प्यार की भरें जल्दी दरार में
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तूफ़ां में जो पला बढ़ा रोके उसी की राह
इतना रहा न दम कभी मुश्ते-ग़ुबार* में (*एक मुठ्ठी ख़ाक )
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मौसम बदल रहा है फ़ज़ा इस क़दर ‘तुरंत ‘
होता भरम ख़िज़ाँ का है कुछ कुछ बहार में
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
१४/०६/२०१८

         

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