सवालों में चले आओ

कभी तो जीस्त के उलझे सवालों में चले आओ ।
जरा तुम बर्फ बनकर दिल के छालों में चले आओ ।।

वफाओं के चरागों को जला कर मैने’ रक्खा है ।
गमों की तीरगी से तुम उजालो में चले आओ ।।

बुतों को भी हँसाने का हुनर पाया खुदा से है ।
सुकूं हर सू यही जन्नत शिवालों में चले आओ ।।

रुहानी इश्क है अपना फलक तक गूँजती हर शै ।
मिलेगें हम सदा यूँ ही ख़यालों में चले आओ ।।

कफस में घुट रहीं साँसें ‘अधर’ खामोश बोलो क्यूँ ?
मिली है छाँव नूरानी बयालों में चले आअो ।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

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