“चाहत का असर ऐसा भी है”…

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नज़रों से सब कुछ कह दे , एक हुनर ऐसा भी है ।
ज़माना क्या कहेगा मुझको , कुछ डर ऐसा भी है ।
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न आँधी का अंदेशा , न कोई ज़लज़ला का ख़ौफ़ ,
राहे-मुहब्बत में आशिक़ का सफ़र ऐसा भी है ।
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ख़ुद से ग़ाफ़िल होकर दूजे में बेहद खो जाना ,
अज़ीब लगता मगर चाहत का असर ऐसा भी है ।
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उसकी रिफ़ाकतें * मयस्सर न हुईं तो कुछ ग़म नहीं ,
मगर ज़ेहन में बसा रहता अक्सर ऐसा भी है ।
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मुज़तरिब * होठों पे है वो एक अधूरी-सी क़सक़ ,
क़माल है मगर इधर एक बेख़बर ऐसा भी है ।
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बेताल्लुक-सी गुज़र जाती है कभी-कभी कुछ ख़बर ,
औ कभी दिल पे ही रह जाती ख़बर ऐसा भी है ।
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एक इशारे में बंद सक़ून के पल को क्या कहें ,
घबराये से रहते सदा हमसफ़र ऐसा भी है ।
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वफ़ा के ख़्वाब तले हिसारे-शौक़ * भी मिल क्या गया ,
बहती दरिया में सभी जाते उतर ऐसा भी है ।
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हुस्न के ये सौदागर भी कम नहीं गरजते इधर ,
मगर ढलती उमर कर देती बंज़र ऐसा भी है ।
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एहले-शौक़ * कुछ ऐसे भी होते इस दरम्यान ,
एहदे-ज़वानी * की न होती फ़िक़र ऐसा भी है ।
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ये इश्क़ का खेल भी इतना आसान नहीं “कृष्णा”,
क़ूए-इंतज़ार * बन जाती भंवर ऐसा भी है ।
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* रिफ़ाक़तें = संगत
* मुज़तरीब = बेचैन
* हिसारे-शौक़ = लालसा का बंधन
* एहले-शौक़ = प्रेम-भक्त
* एहदे-ज़वानी = यौवन की अवधि
* क़ूए-इंतज़ार = प्रतीक्षा की गली
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