“चाहने के बाद भी”…

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2122 212 2122 212
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वो नहीं मायूस है हारने के बाद भी ।
प्यार हो जाता कभी टालने के बाद भी ।
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क्या अजब शै इश्क़ है जान लेते बेख़बर ,
ख़्वाहिशें फिर जी उठे मारने के बाद भी ।
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इम्तहां भी कुछ अलग किस्म का है देख लो ,
पल कभी कटते नहीं काटने के बाद भी ।
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और नज़रों से शबो-रोज़ * गिनना क्या कहें ?
ख़्वाब दिखता है इधर जागने के बाद भी ।
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कुछ पलों का बिछुड़ना भी गवारा है कहाँ ?
डर बना रहता उसे थामने के बाद भी ।
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होश खोने की रिवायत * नज़र आता मगर ,
अधिकतर मदहोश हैं मानने के बाद भी ।
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सफ़र चाहत का भले रूकना मुमकिन न हो ,
मगर “कृष्णा” झिझकता चाहने के बाद भी ।
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* शबो-रोज़ = रात-दिन
* रिवायत = परंपरा
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