“चाहने लगे हैं”…

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वो दिलो-जान से बेइंतेहा चाहने लगे हैं ।
हर अहसास को मिलकर बेझिझक बाँटने लगे हैं ।
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मुलाक़ातों के दौर के बेहद शुक्रग़ुज़ार हैं हम ,
जिसकी वज़ह हमें वो क़रीब से जानने लगे हैं ।
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हमें देखकर ही लिखा आपने , कहना है उनका ,
और वो ग़ज़ल के शेरों पे हक़ माँगने लगे हैं ।
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हसीं ख़्वाब जो देखे थे , अब हो सकता है पूरा ,
इक यक़ीं से सारे ख़्वाब फिर से पालने लगे हैं ।
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हर ख़्वाहिश हमारे जो बिखरे रहे यहीं कहीं पर ,
मुद्दतों बाद अब चाहत को सम्हालने लगे हैं ।
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ये संगत का असर है या शब्दों की कारीगरी ?
वो कलम से बेहतरीन शेर निकालने लगे हैं ।
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उनके प्यार करने का अंदाज़ ज़रा अलग “कृष्णा”,
बेज़ान ज़िस्म में आजकल जान डालने लगे हैं ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 13/07/2018 )

         

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