“ज़ज़्बात गुज़र गई जानां”…

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हसीन लम्हों की चुपके से सौगात गुज़र गई जानां ।
लब कुछ कहते , उससे पहले ही बात गुज़र गई जानां ।
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नज़रें कब तलक से इक उम्मीद लिये राह तकती रहीं ,
मिलना हुआ नहीं , इक हसीं मुलाक़ात गुज़र गई जानां ।
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कोई बेक़रार अभी इंतज़ार न करवाये तो ठीक ,
इक दरस के लिये जाने कितनी रात गुज़र गई जानां ।
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अच्छे पलों का भी दुआओं से मिलना न हुआ मुनासिब ,
एक-एक करके खुशियों की बारात गुज़र गई जानां ।
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क्या खूब किया था जादू बातों के सफ़र के दरम्यान ,
अब क्या कहें , लफ़्ज़ों की हर क़रामात गुज़र गई जानां ।
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लोगों की भीड़ से अब कोई शख़्स खो गया है शायद ,
इक झलक की तलाश में कई ख़्यालात गुज़र गई जानां ।
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चेहरे की मुस्कान झूठी है , अब तुम ये भी जान लो ,
यादों के रास्ते चलके अश्रु इफ़रात गुज़र गई जानां ।
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यूं तो सफ़रे-ज़िंदगी में ख़ुद को अकेले ही पाते हैं ,
कोई फसल करे हरी , कई बरसात गुज़र गई जानां ।
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नये सफ़र में चल पड़े हो तो याद रखना इक बात को ,
नज़र क्या मिला पाओगे , यूं ही साथ गुज़र गई जानां ?
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दो अज़नबी थे हम तो , जो सरे-रहगुज़र मिल गये कभी ,
मगर अब खूब अखर रहा , क्यों लम्हात गुज़र गई जानां ?
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मंज़िल क्या वाक़ई कठिन है “कृष्णा”, राहे-मुहब्बत में ?
सोच-सोचकर ही अब सारी ज़ज़्बात गुज़र गई जानां ।
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