“ज़रा क़रीब से”…

°°°
ख़ुदा कसम , तुम मिल गये हो सनम मुझे बड़े नसीब से ।
आ मेरी ज़िंदगी , देख तो लूँ तुम्हें ज़रा क़रीब से ।
••
दुश्मनों की कोई कमी नहीं है बेदर्द ज़माने में इधर ,
मगर सकूं मिल गया जब मिलना हुआ अज़ीज़ हबीब * से ।
••
तुम्हारी शक्ल में न जाने क्या बात है , बताता हूँ ,
बाकी सभी चेहरे यहाँ दिखने लगे हैं अज़ीब से ।
••
ज्यादा मत उलझ जाना कभी सही-गलत के उलझन पर ,
प्यार हमेशा ही फ़िदा हो गया है किसी तहज़ीब से ।
••
अब कोई मसला नहीं है हमारे मिलन के दरम्यां ,
जाने क्यों तुमसे मिलना लग रहा आजकल तबीब * से ।
••
है बहुत बुराइयाँ मुझमें अभी , मानता ये बात मैं ,
सामने आये अगर मैं सुधर जाऊँ किसी अदीब * से ।
••
क्या परवाह करेगा ये ज़माना यहाँ दीवानों का ?
देख पाते कहाँ हैं लोग सिसकती आहें सलीब * से ?
••
जी करता है बस तुमको चुराकर अपने दिल पे बसा लूँ ,
कुछ डर-सा लग जाता है कभी-कभी अपने रक़ीब * से ।
••
धन-दौलत की चाहत नहीं , रिश्ते अनमोल पूँजी है ,
कभी सामना मत हो “कृष्णा” अहसासों के गरीब से ।
°°°
* हबीब = दोस्त
* तबीब = वैध
* अदीब = अदब सिखाने वाला
* सलीब = फाँसी लगने का स्थान
* रक़ीब = प्रतिस्पर्धी
°°°
— °•K.S. PATEL•°
( 18/12/2018 )

         

Share: