“ज़रा गुफ़्तगू करें”…

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कौन जाने हमारे जी का हाल जिसकी ज़ुस्तज़ू करें ,
ज़ज़्बातों को हमारे अब क्या ज़ाहिर क़ूबक़ू * करें ?
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हम भी बता सकते हैं मचलते हर अरमानों का हाल ,
क़रीब जो आये कोई तो हम भी ज़रा गुफ़्तगू करें ।
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हिज़ाबे-रूख़े-यार * हमारे ख़्वाब में ज़रूर है मगर ,
ख़्वाब बदल जाये हक़ीक़त में तो कोई आरज़ू करें ।
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आग हम भले वो पानी की बूँद , फिर भी रिश्ता होगा ,
नक़्श * साफ हो जाये , किसी के नाम हर पहलू करें ।
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यार मिले जो अगर फूल बरसा दें बिसाते-ऐश * पर ,
वस्ले-यार * में उसके हवाले ज़िंदगी की खूशबू करें ।
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बदलती रूत से बड़ा ताल्लुक़ है हमारे इस सफ़र का ,
साथ हो हमसफ़र तो उसके जैसा प्यार हूबहू करें ।
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यक़ीन दिलाता है आपको ये “कृष्णा” , ऐ रब सुन ज़रा ,
मुँह नहीं फेर पायेगा वो , जिसे हमसे रूबरू करें ।
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* क़ूबक़ू = गली-गली
* हिज़ाबे-रूख़े-यार = प्रियतम का
आवरण
* नक़्श = चित्र
* बिसाते-ऐश = सुख और आनंद
की बिसात पर
* वस्ले-यार = प्रेयसी का मिलन
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— °•K.S. PATEL•°
( 22/04/2018 )

         

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