“ज्यादा ऐतबार हो गया”…

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अपनी तरक़श में जो तीर रखे हैं , वो बेकार हो गया ।
क्योंकि कोई और किसी का संसार हो गया ।
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और ये भी सत्य है कि बड़ी दुविधा की घड़ी आन पड़ी ,
एक नादां बिन पूछे ही इश्क़ का दावेदार हो गया ।
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पता है ये दौरे-तमन्ना तो कभी खत्म नहीं होगी ,
ज़ेहन में लगे मानो अनचाहा खरपतवार हो गया ।
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ज़रूरी नहीं कि कोई दिल के बदले दिल ही दे ,
जाने क्यों गुज़रते पलों पर ज्यादा ऐतबार हो गया ।
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बाहर से कुछ ज़ख़्म दिखे तो ज़रा इलाज़ भी करवा लें ,
क्या करें उसका जो कोई तीर ज़िगर के पार हो गया ।
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ये दिल भी कमबख़्त बहुत शैतान हो चला है आजकल ,
कहता , ख़बर पढ़ें कैसे पुराना जो अख़बार हो गया ।
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ये चाहत की ख़ुमारी है या इंतज़ार की इंतेहा ?
उसे चाहने के बाद ही ख़ुद से बेहद प्यार हो गया ।
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इक हक़ मिले तो बेहतर , दुनिया से निकलने के पहले ,
मगर सोचना मत , एहसासों का खरीददार हो गया ।
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कृष्णा तो “कृष्णा” है , वो दायरे में बंधेगा कैसे ?
उसे तो जिसने चाहा , उसका उस पर अधिकार हो गया ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 30/04/2018 )

         

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