“ढल जाऊँ मैं”…

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जी कर रहा आज तो बह जाऊँ मैं।
फ़िज़ा जो कहे उसमें ढल जाऊँ मैं ।
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कोई पढ़ ले मुझको अगर इक बार ,
सच में , सुंदर-सा अक्षर बन जाऊँ मैं ।
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ज़िंदगी के ज़द्दोज़हद में सब हैं बाहर ,
सब वापस आये अगर तो घर जाऊँ मैं ।
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इतनी दुश्मनी भी कुछ ठीक नहीं ,
गलती बता दो तो आज सुधर जाऊँ मैं ।
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काश विचारों का भी पतझड़ होता ,
ठीक न हो तो बताना , झड़ जाऊँ मैं ।
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कोई प्यास बता तो दे अपने मन की ,
तो इधर अहसासों से भर जाऊँ मैं ।
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अच्छा नहीं लगता बेवज़ह की दूरियाँ ,
कोई और मिला तो कह दो , हट जाऊँ मैं ।
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कोई परवाह नहीं है अपने अंज़ाम की ,
तुम शमा बन तो जाओ , जल जाऊँ मैं ।
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इतना भी खोटा सिक्का नहीं है ये “कृष्णा”,
तुम साथ अगर दो तो चल जाऊँ मैं ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 06/05/2019 )

         

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