“तेरा-मेरा अफ़साना भी”…

°°°
क्या ख़बर दें जानाँ , कुछ रूठना-कुछ मनाना भी ।
ख़त्म आसान नहीं , तेरा-मेरा अफ़साना भी ।
••
क्या खूब अदा है तेरा , आज ज़माने से अलग ,
कैसे भूल जायें , वो छुप-छुप के शरमाना भी ?
••
हुस्न और इश्क़ के बीच ये अज़ीब-सी क़श्मक़श ,
शमा की लौ रौशन और उड़ चला परवाना भी ।
••
तड़प की मिसाल देख भी लो ज़रा दीवाने का ,
कब से सहेज रखा है ये तेरा तड़पाना भी ।
••
बहाना कुछ भी हो आँख से दरिया निकलने का ,
आसां नहीं है भुलाना अश्क़ों का बहाना भी ।
••
कभी-कभी हारने का भी मज़ा कुछ और ही है ,
दिल तुझसे हार क़बूल किया तेरा सताना भी ।
••
तोहमत न लगाना कभी इश्क़ की करामात पर ,
किस्मत वालों को मिलता है ऐसा घबराना भी ।
••
दो ज़िस्म मगर इक जान की सुंदर आज़माईश ,
देखता रह जाता है इधर ज़ालिम ज़माना भी ।
••
वाकई प्यार की परीक्षा कुछ मुश्किल है “कृष्णा”,
मगर सही नहीं हर पल किसी को आज़माना भी ।
°°°
— °•K.S. PATEL•°
( 10/05/2018 )

         

Share: