तेरे ख़यालों में गुम रहें हम

++ग़ज़ल++(12122 12122 12122 12122 )
तेरे ख़यालों में गुम रहें हम ये अपनी आदत सी हो रही है |
ये राज़ तुझको बताएं कैसे हमें मुहब्बत सी हो रही है |
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कोई अचानक हमारे दिल में बसा है ऐसे कि जैसे मूरत
यक़ीन हमको नहीं खुदा पर मगर इबादत सी हो रही है |
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पयाम जब से सबा ये लाई कि आना तय हो गया है तेरा
मची है खेमा-ए-दिल में हलचल अज़ीब आफ़त सी हो रही है |
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हयात में जो क़दम पड़े हैं मकान घर बन गया हमारा
ये आसमाँ आ गया ज़मीं पर ज़मीं ये जन्नत सी हो रही है |
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हया की सुर्खी से हुस्न बढ़कर चला रहा है गज़ब का जादू
सजा जो गुल काकुलों में बरपा इधर क़यामत सी हो रही है |
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तेरा तसव्वुर ये ख्वाब तेरे बने हुए ज़िंदगी का हिस्सा
है दूरियां पर हमें ये लगता कि तेरी कुर्बत सी हो रही है |
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तनाब साँसो की तेरे जिम्मे ये ज़िंदगी अब तेरे हवाले
तेरे लिए अब है जीना मरना हमारी चाहत सी हो रही है |
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है वस्ल का दिन ऐ चाँद मुखड़ा छुपा नक़ाबों में बादलों की
ज़मीं पे उतरा ये चाँद देखूँ यही ज़रूरत सी हो रही है |
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बड़े दिनों से थे मुंतज़िर हम ‘तुरंत’ दीदार-ए-महजबीं हो
है शुक्र लगता अभी अभी ये खुदा की रहमत सी हो रही है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
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शब्दार्थ – पयाम=सन्देश , सबा=प्रातः कालीन हवा ,
खेमा-ए-दिल= दिल का तम्बू ,हयात=ज़िंदगी ,
काकुलों=जुल्फों ,तसव्वुर=कल्पना, कुर्बत=नज़दीकी ,
तनाब=रस्सी,डोर ,वस्ल=मिलन, मुंतज़िर=प्रतीक्षा में ,
दीदार-ए-महजबीं=चाँद जैसे ललाट वाली का दर्शन
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