“प्रीत की राह में”…

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हर पल मन लालायित है उसको पाने की चाह में ।
आज तो कोई अड़ंगा न डालो प्रीत की राह में ।
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अपने मन की बात मानने का आनंद कुछ अलग ,
भौहें तन जाती है हर क्षण कुछ विपरीत सलाह में ।
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मुस्कुराहट आने को आतुर है मेरे घर में यदि ,
दिन भी कम पड़ने लगते हर वर्ष प्रत्येक माह में ।
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कोई देख ले उसे जी भरके अपने नयन से यदि ,
कुछ भी काम हो पाता है नहीं क्रोध और डाह में ।
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भले लाख कोस दूर कोई नगर में पड़े हुए हैं ,
किंतु छवि मीत का भूलना कहाँ होता इधर आह में ?
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कभी अवसर मिले तो एक प्रयास कर लेना अवश्य ,
प्रेम प्रस्फुटित होगा जाकर देखना इसे थाह में ।
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अब दोष तो नहीं देना “कृष्णा” को कि कुछ लिखा नहीं ?
एक ग़ज़ल निर्मित हो गयी हल्की-सी कराह में ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 20/06/2018 )

         

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