“बातें करो”…

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बेख़ुदी बढ़ चली है , अब तुम राज़ की बातें करो ।
कल में जीना मंज़ूर नहीं , आज की बातें करो ।
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अंतिम पड़ाव आये उससे पहले समझ लो बात ,
दो पल के लिये प्यार के आग़ाज़ की बातें करो ।
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आओ खो जाएँ बचपन की तरह हसीं ख़्वाबों में ,
क़रीब आ ज़रा हसरते-परवाज़ * की बातें करो ।
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वक़्त हाथ से निकल न जाए कहीं वक़्त से पहले ,
जी भर जाए कुछ ऐसी अंदाज़ की बातें करो ।
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अच्छी नहीं होती है ये बेमतलब की चुप्पियाँ ,
बेहतर होगा ये सकूते-नाज़ * की बातें करो ।
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अपनी मधुर बोल को न छुपाकर रखो ज़माने से ,
हक़ीक़त में उस मखमली आवाज़ की बातें करो ।
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कोई शिक़ायत न होगी दर्द बाँटने के दौरां ,
हमदर्द-सा लगे जो उस अल्फ़ाज़ की बातें करो ।
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कोई इल्ज़ाम न लगा पाये ये दुनिया के लोग ,
सुनो , कुछ इस तरह नशेबो-फ़राज़ * की बातें करो ।
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अगर जी भर गया हो मुहब्बत की बात कर “कृष्णा”,
तो अब कुछ ऊपर वाले सरताज़ की बातें करो ।
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* हसरते-परवाज़ = उड़ने की लालसा
* सकूते-नाज़ = नाज़ भरी ख़ामोशी
* नशेबो-फ़राज़ = ऊँच-नीच
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— °•K.S. PATEL•°
( 07/06/2018 )

         

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