“मिला वो”…

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कभी इक हक़ीक़त तो कभी ख़्वाब-सा मिला वो ।
कभी थोड़ा तो कभी बेहिसाब-सा मिला वो ।
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कभी उसका अहसास समझना मुश्किल होता ,
कभी चाहत से भरा लाज़वाब-सा मिला वो ।
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कभी अनसुलझा सवाल जैसा वो लगता था ,
तो कभी सुलझा मुक़म्मल ज़वाब-सा मिला वो ।
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कभी हर क़शिश था इधर-उधर बिखरा हुआ सा ,
तो कभी चाहत में छपा किताब-सा मिला वो ।
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कभी मन की गहरी झील में शाँत पड़ा रहा ,
तो कभी दिल में उठता सैलाब-सा मिला वो ।
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कभी साथ , जिसकी कमी महसूस होती रही ,
कभी महकते दोस्ती का गुलाब-सा मिला वो ।
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कभी ज़माने के डर से सहमा नज़र आया ,
तो कभी सच कहूँ , मौज़े-शबाब-सा * मिला वो ।
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कभी हाथ से निकलता हुआ बाज़ी-सा लगा ,
तो कभी हासिल हो चुका ख़िताब-सा मिला वो ।
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कभी इक राह का मुसाफ़िर बना रहा “कृष्णा”,
तो कभी अकेले का ही हिसाब-सा मिला वो ।
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* मौज़े-शबाब = यौवन की तरंग
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— °•K.S. PATEL•°
( 09/05/2018 )

         

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