मुद्दतों भूले हुए थे

ग़ज़ल

साथ तेरा इस क़दर अच्छा लगा
रास्ता भी पुर ख़तर अच्छा लगा

ग़ैर को अपना बना लेता है तू
गुफ़्तगु का ये हुनर अच्छा लगा

मश्वरे देता है मुझको क़ीमती
घर का वो बूढ़ा शजर अच्छा लगा

साथ गुज़रा जो तुम्हारे साथ बस
ज़िंदगी का वो सफ़र अच्छा लगा

बाद मुद्दत आँख में आई चमक ”
आप घर आए तो घर अच्छा लगा”

क़ैद से आज़ाद भी हम हो गए
अब मिली परवाज़ पर अच्छा लगा

मुद्दतों भूले हुए थे जिसको साद
आज उस को सोच कर अच्छा लगा

अरशद साद रुदौलवी

         

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