“मैं सोचता हूँ”

°°°
क्या है इश्क़-मोहब्बत-प्यार , मैं सोचता हूँ ।
क्या इनपे टिका है संसार , मैं सोचता हूँ ।
••
कुछ का वक़्त गया तो राय भी हो गया अलग ,
क्यों लगे इनको खरपतवार , मैं सोचता हूँ ।
••
मगर सब एक तरह हों , ये भी ज़रूरी नहीं ,
कुछ बचा लेते कैसे धार , मैं सोचता हूँ ।
••
जब प्यार किसी से है , कर ही डालो ,
ठीक नहीं अटकना मँझधार , मैं सोचता हूँ ।
••
ज़िंदगी की अमोल कमाई है एक भरोसा ,
मगर टूटता क्यों ऐतबार , मैं सोचता हूँ ।
••
एक बार की गलती कुछ समझ में आती है ,
गलती होती क्यों बार-बार , मैं सोचता हूँ ।
••
जानता “कृष्णा” , इश्क़ की प्यास बुझेगी नहीं ,
फिर भी दिल क्यों है बेक़रार , मैं सोचता हूँ ।
°°°
— °•K.S. PATEL•°
( 18/04/2019 )

         

Share: