मौत सर पे ही खड़ी हो जैसे

2122 1122 22

मौत सर पे ही खड़ी हो जैसे
साँसे आपस में लड़ी हो जैसे

दिल ने फ़िर कर दी बग़ावत हमसे
नज़रे उनसे ही भिड़ी हो जैसे

नैनों  से  बहने  लगेंगी  धारा
नैन  से  नैन  लड़ी  हो  जैसे

पैरों में कंकड़ चुभे आपके जो
चेहरें  में  शिकं  पड़ी  हो जैसे

मज़बूत होंगी नफ़स की दीवारें
ज्योँ नज़र खुद पे पड़ी हो जैसे

ज़िंदगी में भी कहद आयी हो
भूख़  से वो भी लड़ी हो जैसे

ज़िंदगी  मौत  से  घबरायेगी
ख़ाख  से  राख उड़ी हो जैसे

बीज़ नफ़रत की दिलों में न रखो
इक फ़सल दिल में खड़ी हो जैसे

उलझनों को मैं ही क्यों प्यारा लगूँ
उलझनें मुझसे अड़ी हो जैसे

-आकिब जावेद

         

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