“ये चाहत के हुनर”…

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तेरा अश्क़ मेरीे आँखों से आज निकल गया ।
दो ज़िस्म एक जान हैं , यक़ीनन पता चल गया ।
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कुछ ग़म मिले , कुछ ज़ख़्म मिले तुझसे दूर रहकर ,
मगर तेरी एक झलक से , सब कुछ ही बदल गया ।
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बैचेन होठों की वो बेतक़ल्लुफ-सी हंसी ,
उस पल को देखने के लिये ये दिल मचल गया ।
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सर्द रातों में मैं था जाड़े का एक ठिठुरन ,
हुआ तेरा स्पर्श जो , इंतज़ार भी पिघल गया ।
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तेरी बाँहों में लिपटूँ तो ज़हान हो मेरी ,
तेरी मुट्ठी में जान लो जीवन सम्हल गया ।
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ज़िंदगी के सफ़र में बनने को तेरा हमसफ़र ,
तेरे साँचें में बड़ी आसानी से ढल गया ।
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ये चाहत के हुनर को “कृष्णा” , जाने न कोई ,
मगर इश्क़ में कोई किसी को ज़रूर छल गया ।
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