रोका मगर ये आपके रुख़ पर ठहर गए

++ग़ज़ल++ (221 2121 1221 212)
रोका मगर ये आपके रुख़ पर ठहर गए
गुस्ताखियां जनाब मेरे चश्म कर गए
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रोशन शवाब कनखियों से झाँक आप का
देखा क़मर ज़मीन पे हैरत से भर गए
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कैसा हुआ है चश्म पे जादू सा इक असर
साया जिधर है आपका ये भी उधर गए
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क्या जिक़्र-ए-बेख़ुदी करें जब होश ही नहीं
कब आप दिल की झील में चुप चुप उतर गए
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अब्रू-कमान खींच गिरा दी उठा पलक
क़ातिल अदा से नीम-जां यूँ आप कर गए
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नज़दीक आई वस्ल की घड़ियाँ ज़रा तो आप
अफ़सोस है ज़माने की बातों से डर गए
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लम्हात पुरसुक़ून भी देता खुदा है कम
बस देखते ही देखते दिन वो गुज़र गए
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अब तो बचे हैं आपकी यादों के बस सराब
इस ज़ीस्त से सभी हसीं शाम-ओ-सहर गए
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तूफ़ान ऐसा आ गया फिर ज़ीस्त में ‘तुरंत ‘
उल्फ़त के आशियाने के तिनके बिखर गए
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
01 /04 /2018
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शब्दार्थ -क़मर=चाँद ,अब्रू=भौहें ,नीम-जां=अधमरा
पुरसुक़ून=शांतिमय ,सराब =मृगतृष्णाएं

         

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