वो हमीं से बेखबर हैं

हम जिन्हें पलकों पे रखते वो हमीं से बेखबर हैं |
हम खुदा जिनको समझते वो हमीं से बेखबर हैं |
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हम लिबासों में जरा सा दाग लगने भी न देते,
जिनको सजते हैं सँवरते वो हमीं से बेखबर हैं |
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खारों से लबरेज हैं जो इश्क के इन रासतों से,
जिनकी खातिर हम गुजरते वो हमीं से बेखबर हैं |
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दिल से उठते हैं घुमड़कर अपनी आँखों के ये बादल,
जिनकी यादों में बरसते वो हमीं से बेखबर हैं |
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उनकी अब इस बेऱुखी से क्या बताएं क्या गुजरती,
टूटकर पल पल बिखरते वो हमीं से बेखबर हैं |
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दिल के मन्दिर में सजाकर अब करीने से रखा है,
रोज सजदा जिनको करते वो हमीं से बेखबर हैं |
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कोई कीमत ही नहीं है वो मनुज उन पर फिदा क्यों,
हम जिन्हें बस चाँद कहते वो हमीं से बेखबर हैं |

         

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