शाम ढलने लगी रात होने लगी

++ग़ज़ल++(212 212 212 212 212 212 212 212 )
शाम ढलने लगी रात होने लगी धीरे धीरे जवाँ आप आ जाइये
चाँद भी सो रहा लग रहा है बहुत आज दिलकश समाँ आप आ जाइये
***
है अमावस की शब और फ़ज़ा भी ग़ज़ब लाख जुगनू फ़लक पर बिखेरे हुए
दिख रहा है मुझे दरमियाँ तारों के झाँकता कहकशाँ* आप आ जाइये (* आकाशगंगा )
***
हल्की हल्की फुहारें भिगोती है तन आज मदमस्त हो बह रही है पवन
दो घड़ी को रुका फिर बरसने लगा एक अब्र-ए-रवाँ* आप आ जाइये (*घूमता हुआ बादल)
***
याद बैचैन करने लगी है मुझे और तस्सवुर में दीदार होने लगा
रू ब रू देखने को मचलने लगा दिल तो नूर-ए-जहाँ* आप आ जाइये (*दुनिया का प्रकाश )
***
आज की रात आई है अरमाँ भरी आ गई इश्क़ इज़हार की वो घड़ी
कीजिये अब करम छोड़िये सब भरम वक़्त है मेहरबाँ आप आ जाइये
***
ज़िंदगी में बहारों के रस्ते खुलें चश्म से चश्म और दिल से भी दिल मिलें
लब से लब भी करें खुल के हर गुफ़्तगू है क़सम जानेजाँ आप आ जाइये
***
जश्न-ए-जज़्बात है वस्ल की रात है ज़िंदगी के लिए एक सौगात है
कीजिये हर मुक़म्मल तमन्ना सनम अब हर इक पल गराँ* आप आ जाइये (*क़ीमती )
***
कर रहा है सभी इंतज़ामात रब आज के बाद मौका मिले जाने कब
आज खोना न हमको ये रंगीन शब आ रही हिचकियाँ आप आ जाइये
***
देर मत कीजिये आज मत लीजिये सब्र का मेरे कोई सनम इम्तिहाँ
बस ‘तुरंत’ आइये आज देखें नहीं कोई सूद-ओ-जियाँ* आप आ जाइये (*नफ़ा नुक्सान )
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी .

         

Share: