“सब हूँ मैं”…

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कोई गौर करे तब जान पाए सब हूँ मैं ।
न जाने मुझको तब ज़रूर कहे अज़ब हूँ मैं ।
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बैचेनी से ही गुजर जाता है पूरा दिन ,
रहता अकेला , सरे-रहगुज़ारे-शब * हूँ मैं ।
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ये भी सोचने का ज़रा समय नहीं आजकल ,
किसी की ज़िंदगी में तो कहीं बे-सबब * हूँ मैं ?
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लाख कहे ज़माना मेरे बारे में कुछ भी ,
मुझे पढ़ोगे तब ही जानोगे अदब हूँ मैं ।
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मेरा क़सूर केवल इतना कि हूँ दीवाना ,
क्या करूँ क़शिश बढ़ाने का एक सबब * हूँ मैं ।
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हो कोई बात दिल में तो साफ-साफ कहना ,
बुरा मानने वाला बंदा भला कब हूँ मैं ?
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सच , खुशी से कहीं मर ही न जाए ये “कृष्णा”,
सुन लिया जो एक बार किसी का तलब हूँ मैं ।
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* सरे-रह-गुज़ारे-शब = रात के रास्ते पर
* बे-सबब = अकारण
* सबब = कारण
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— °•K.S. PATEL•°
( 14/12/2018 )

         

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