समझ लिया

जितना तुझे ज़रूरी था उतना समझ लिया
कर बैठा भूल तुझको जो अपना समझ लिया

पहले तो टूट कर के बिखरना समझ लिया
फिर मैंने ज़िंदगी का सँवरना समझ लिया

पहरे हज़ार होते हैं दरबार हमनशीं
आसान उनसे आपने मिलना समझ लिया

मग़रिब के बाद लोग चढ़े छत पे और फिर
सबने तुम्हें ही चांद निकलना समझ लिया

महसूस हमने कर लिया हिज्रत की आग को
आदम का ख़ुल्द से भी निकलना समझ लिया

देखा जो हुस्न-ए-यार की ख़ुद पर इनायतें
पत्थर का हमने आज पिघलना समझ लिया

आए जो एक रात मुलाक़ात के लिए
आगँन में हमने चांद उतरना समझ लिया

बज़्म-ए-अदब अना की नहीं बात कुछ सुनी
बेहतर वहां पे ख़ुद का है झुकना समझ लिया

बेकार अपने ज़हन पे देते हैं जोर क्यूँ
हमको था जितना साद समझना समझ लिया

अरशद साद

         

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