“सलामत है” …

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गुजरे ज़माने का ख़ूबसूरत अंज़ाम सलामत है ।
दे जाती नयी ज़िंदगी वो यादें तमाम सलामत है ।
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पल-पल में लड़ना और पल-पल में जल्द मिल भी जाना ,
इक-दूसरे का होता अज़ब एहितराम सलामत है ।
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भले उम्र का दौर बेहिसाब निकलता दिख रहा अभी ,
मगर बचपन का बेतक़ल्लुफ़ प्यारा नाम सलामत है ।
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कितना प्यारा था वो हसीं ख़्वाबों का निश्छल संसार ,
हक़ के साथ लगा जाते थे जो इल्ज़ाम , सलामत है ।
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न ही घर आने का ठिकाना , न ही खाने का ठिकाना ,
मगर बिंदास खेलते रहने का ब्यायाम सलामत है ।
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बिछुड़ जाने का इक अजीब-सा डर जाने कहाँ गया ?
अब तो भागमभाग ज़िंदगी में बस सलाम सलामत है ।
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खट्टी-मीठी प्यार-तक़रार अभी भी महफ़ूज़ “कृष्णा” ,
तन्हाई से बहुत दूर दोस्ती का धाम सलामत है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 06/08/2018 )

         

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