सलाम मिल गया है

मौहब्बत को मेरी , ईनाम मिल गया है
नजर को नजर का , सलाम मिल गया है

उसके महकते बदन की ये खूशबू
प्यासी निगाहों को , जाम मिल गया है

जब से मिला है खत, बदले में खत के
सुबह.शाम करने को, काम मिल गया है

जमानें के डर ने, जीनें दिया कब
वो पास आया , मुकाम मिल गया है

मेरी तमन्ना , तेरी आरजुओं को
कागज ..ए…दिल पै, मुकाम मिल गया है

बहकनें दो मुझको, चहकनें दो मुझको
“सागर” मौहब्बत को , नाम मिल गया है !!
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मूल शायर ….
डाँ. नरेश कुमार “सागर”

         

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