सूरत में चाँद

सूरत में चाँद उनकी, दिखने लगा हमें तो|
हँसकर के एक चेहरा ठगने लगा हमें तो|
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पतझड़ या बारिसों में जब भी वो पास आये,
मौसम वही सुहाना लगने लगा हमें तो|
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आजाद वो परिन्दे उड़ते मगर यूँ उनका,
हर शाख पर उतरना चुभने लगा हमें तो|
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जाना उन्हीं का हमको देता है मोत लेकिन,
आने का ख्वाब जिन्दा रखने लगा हमें तो|
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माँगी रिहाई हमने हुस्नो जमाल से पर,
आगोश में ‘मनुज’वो कसने लगा हमें तो|

         

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