“सोने न दिया”…

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यादों में आकर कल शब-भर यार ने सोने न दिया ।
क्या बतलाएँ हाल , हसरते-प्यार ने सोने न दिया ।
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रोज ही इश्क़ तैयार कर रहा है नये अफ़साने ,
कुछ यूँ कहें तो चाहत के रफ़्तार ने सोने न दिया ।
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कल वादा किया कि ज़रूर मुलाक़ात होगी हमारी ,
हाय ! मगर सुबह के इस इंतज़ार ने सोने न दिया ।
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लब ख़ामोश-से हैं , कैसे बतायें इस दिल का हाल ?
बचा था अब जो हसरते-दीदार ने सोने न दिया ।
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ये आशिक़ी भी शायद ग़ुनाह बन गई है , क्या करें ?
मुहब्बत में हुए कुछ नये करार ने सोने न दिया ।
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भूलकर भी भुलाना हो पाता नहीं अहसासों को ,
ज़ज़्बातों के निकलते मधुर बयार ने सोने न दिया ।
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होशो-हवास में रहना मगर बुत जैसा भी बने ,
मुद्दतों बाद हुए एक इक़रार ने सोने न दिया ।
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जिस तरह से ख़्वाहिश की थी मैंने ज़िंदगी से ,
जादू था या हक़ीक़त , ऐतबार ने सोने न दिया ।
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अब कोई बताए इसमें “कृष्णा” की क्या गलती है ?
सुंदर अंदाज़ औ मिज़ाज़े-यार ने सोने न दिया ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 12/02/2019 )

         

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