“हमराही मेरे”…

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हमराज़ बनकर ज़िंदगी में उतर गये हो हमराही मेरे ।
नज़रों में चाहत बनकर सँवर गये हो हमराही मेरे ।
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जीवन का कोई मतलब पूछे तो बताऊँ तुम हो ,
कुछ सोच-समझकर दिल के अंदर गये हो हमराही मेरे ।
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पास होते हो जब कभी सारे ग़म होते हैं कोसों दूर ,
खुशियाँ बनकर मेरे दर ठहर गये हो हमराही मेरे ।
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सुना था कि संगति का असर बहुत जल्दी ही दिख जाता है ,
ज़रा शीशा देख लो , खूब निखर गये हो हमराही मेरे ।
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मुझे पता है तुम्हारी अनमोल संगत का इक खास असर ,
बहार आई है उस तरफ़ जिधर गये हो हमराही मेरे ।
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मैं ये नहीं कहता कि तुम भी आजकल कुछ हैरान हो नहीं ?
इक मुहब्बत मेरे हवाले कर गये हो हमराही मेरे ।
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कुछ ज्यादा ज़ख्म दिया ज़हान ने तुम्हारे “कृष्णा” को मगर ,
इन ज़ख़्मों को आसानी से भर गये हो हमराही मेरे ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 10/10/2018 )

         

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