खुदा जब जब उतर जाये

++ग़ज़ल++(१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ )
अगर करनी पे तू अपनी खुदा जब जब उतर जाये
गुरूर-ओ-ऐब इन्सां का क़सम से सब उतर जाये
***
ग़रीबों का भला होना है गर तो एक ही रस्ता
ज़मीँ पर बेबसों की ख़ुद मदद को रब उतर जाये
***
सियासतदाँ ज़रा जनता की फरियादों पे फ़रमा गौर
नशा वरना ये सत्ता का वो चाहे जब उतर जाये
***
ज़रा सा होश में आ लूँ नज़र तो तब मिलाऊँगा
किसी सूरत इन आँखों का ख़ुमार-ए-शब उतर जाये
***
सुकूँ चैन-ओ-शराफत अम्न का मौसम भी आये गर
रगों से क़ल्ब* से इंसान के मजहब उतर जाये (*दिल )
***
किसी की तिश्नगी हर हाल में बढ़नी यक़ीनन है
तेरी आँखों के साग़र में जो तिश्ना-लब* उतर जाये (*प्यासा)
***
रखी उम्मीद साहिल की सफ़ीना है तलातुम में
चढ़े दरिया का पानी है न जाने कब उतर जाये
***
अजूबा आठवां होगा कोई इंसान मुश्किल में
किसी की भी मदद करने बिना मतलब उतर जाये
***
‘तुरंत’ आँखों की फितरत का है अंदाज़ा नहीं मुमकिन
कभी मोती उतर जाये कभी मशरब* उतर जाये (*झरना )
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |
१९/०६/२०१८

         

Share: