“आरक्षण”…

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आरक्षण के नाम पर फिर से एक दिन बंद हो गया है ।
क्या हो रहा है सोचकर चिंता में आँखें भिगो गया है ।
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देश के लिये सोचना , नहीं इसे है अब नोचना , मगर ,
कुछ भाग हिंसा में डूबा , कुछ राजनीति में खो गया है ।
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आँखें खुली है मगर स्वयं का स्वार्थ कुछ और है कहता ,
सब कुछ देखकर भी अच्छा विचार कहीं सो गया है ।
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क्या शहर में और क्या गाँव में , सब देखे हैं ये मंज़र ,
योग्यता किनारे में छुपकर सुबक-सुबककर रो गया है ।
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एक दशक तक आरक्षण व्यवस्था रहेगी , सब भूल गये ,
वोट-बैंक की राजनीति बस इस मुद्दे को ढो गया है ।
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आरक्षण करना ही है तो निर्धन-ज़रूरतमंद का हो ,
वर्ग और समुदाय का बीज न जाने कौन बो गया है ?
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ये आरक्षण का ज़हर जल्दी ही रोकना होगा “कृष्णा”,
तब कहेंगे हम जातिवाद का कलंक देश धो गया है ।
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