आसमाँ से झाँक कर रोता ख़ुदा भी ज़ार ज़ार

++एक बे-रदीफ़ ग़ज़ल ++(2122 2122 2122 212 /2121 )
आसमाँ से झाँक कर रोता ख़ुदा भी ज़ार ज़ार
टूटता देखा दिलों के दरमियाँ जब जब है प्यार
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फ़ासलों की जब कभी दीवार की तामीर हो
किर्चियों में हैं बिखरते क़ौल क़समें और क़रार
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प्यार के गुलशन के होंगे हाल क्या मत पूछिए
दस्तकें देती ख़िज़ाँ जब रूठ जाती है बहार
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अब्र* बरसे हिज़्र के तो ज़ीस्त गुज़रे किस तरह (*बादल)
और झरते हों मुसल्सल दर्द-ओ-ग़म के आबशार*(*झरने )
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आदमी की फ़ितरतें देखी बदलती इस क़दर
रफ़्ता रफ़्ता घट रहा है दरमियाँ अब एतबार
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उलझनों का सिलसिला यूँ चलता है ता-ज़िंदगी
एक होती दूर है और दूसरी सर पर सवार
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मशवरा देता हमेशा मानिये मत मानिये
खूब तहकीकात कर चुनिए जहाँ में राज़दार
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आपके हालात हैं गर ठीक फिर कुछ सोचिये
उनके बारे में है जिनकी ज़िंदगानी नार नार*(*नर्क के समान )
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आरज़ू है एक ऐसा शेर कह डालूं तुरंत ‘
बाद मरने के भी बोलें लोग-“आहा शानदार ”
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |

         

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