“आहिस्ता-आहिस्ता”…

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सुधरने लगी है आजकल हालत आहिस्ता-आहिस्ता ।
कोई जान गया मेरी ज़रूरत आहिस्ता-आहिस्ता ।
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नफ़रत के बाज़ार में क्या रखा है यार , न जाओ उधर ,
इधर आओ ज़रा , होगी मुहब्बत आहिस्ता-आहिस्ता ।
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दो शख़्स के बीच आपस में समझ होना बहुत ज़रूरी ,
सदा दूर ले जाती हर शिक़ायत आहिस्ता-आहिस्ता ।
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खुशियों को हासिल करने का ये तरीका कुछ ठीक नहीं ,
अहसास में घुसने लगी सियासत आहिस्ता-आहिस्ता ।
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बेईमानों को ताज़ क्या मिल गया है इस ज़माने में ,
भटकने लगी है अब तो शराफ़त आहिस्ता-आहिस्ता ।
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सच का दामन छोड़ने से पहले ज़रा-सा सोच भी लो ,
कभी न कभी खुलेगी हर हक़ीक़त आहिस्ता-आहिस्ता ।
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किसी को हमेशा “कृष्णा” मत रखो बंधनों में जकड़कर ,
मालूम न होगा , होगी बग़ावत आहिस्ता-आहिस्ता ।
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